Nirjala Ekadashi 2025: निर्जला एकादशी व्रत की महिमा, विधि और कथा..
क्या है निर्जला एकादशी?
ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है, निर्जला एकादशी Nirjala Ekadashi. हिंदू धर्म में सबसे कठिन और पुण्यदायक एकादशियों में से एक मानी जाती है। इस दिन बिना जल के उपवास रखा जाता है, इसलिए इसे “निर्जला” एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है. इस बार ये व्रत 6 जून 2025 को मनाया जाएगा.
आप विष्णु सहस्रनाम सुन रहें हैं. इस व्रत का पुण्य प्राप्त करने का ये सरल मार्ग हैं.
जो भक्त पूरे साल भर में आनें वाली अन्य एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते, अगर वे केवल निर्जला एकादशी Nirjala Ekadashi का व्रत रखते हैं, तो उन्हें वर्ष में आने वाली सभी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। इस साल ये व्रत 6 जून 2025 दिन शुक्रवार को किया जाएगा.
आइए आचार्य दीपक जी से जानते हैं व्रत की विधि, व्रत में पूजन विधि, व्रत का महत्व और व्रत में क्या ना करें.
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व्रत की विधि:
धर्म ग्रंथों के अनुसार इस व्रत को बहुत ही कठिन और कष्टकारी होने के साथ साथ बहुत अधिक पुण्य देनें वाला माना है. उसी तरह इस व्रत की विधि भी बहुत कठिन है. धर्म ग्रंथों में बताई गयी विधि आपको बताते हैं.
1.इस व्रत का नियम एक दिन पहले की रात्रि से शुरू हो जाता है.
2. एक दिन पहले ही शाम के समय से पहले आपको भोजन करना है.
3. व्रत के एक दिन पहले ही आपको शाम से पहले ही जल पीना है.
4. रात भर भगवान विष्णु का कीर्तन करें.
5. जिस दिन ये वर्त पड़े उस दिन, सुबह सूर्य उदय से पहले ही स्नान कर लें.
इस प्रकार व्रत विधि है अब आगे जानिए व्रत में पूजन विधि…
पूजन विधि:
- प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें।
- भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएं।
- पंचामृत, तुलसी पत्र, पीले फूल, फल, और मिठाई से पूजन करें।
- व्रत का संकल्प लें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
- दिनभर जल भी ग्रहण न करें (निर्जला उपवास)।
- रात्रि में भगवान की कथा सुनें और भजन-कीर्तन करें।
- अगले दिन द्वादशी को ब्राह्मणों को दान देकर व्रत का पारण करें।
व्रत का महत्त्व:
1. पापों का नाश होता है.
2. शरीर और आत्मा की शुद्धि होती है.
3. मोक्ष की प्राप्ति होती है.
4. पुण्य के फल स्वरूप भगवान विष्णु की कृपा मिलती है.
व्रत में क्या ना करें:
1. किसी के प्रति गुस्सा ना करें.
2. विष्णु भगवान के आलवा किसी अन्य का चिंतन ना करें.
3. किसी प्रकार का व्यसन ना करें.
4. किसी प्रकार का आसक्ति युक्त कार्य ना करें.
5. किसी का दिल ना दुखाएं.
6. किसी भी कार्य का श्रेय स्वयं ना लें.
व्रत को शुभ फल दायक बनाने के लिए विष्णु चालीसा का पाठ करें.
व्रत का पूरा लाभ पानें के लिए खाटू श्याम चालीसा का पाठ करें.
घर में लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें.
Nirjala Ekadashi 2025: निर्जला एकादशी व्रत कथा :
जब वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था तब युधिष्ठिर ने कहा – हे नारायण! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिए । भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन्! इसका वर्णन परम धर्मात्मा व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान् हैं।
तब वेदव्यासजी कहने लगे- कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है । द्वादशी को स्नान करके पवित्र होकर फूलों से भगवान केशव की पूजा करें । फिर पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करें । यह सुनकर भीमसेन बोले- परम बुद्धिमान् पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिए । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख सहन नहीं हो पाती ।
भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा- यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक को प्राप्त करने की चाह है तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना चाहिए ।
भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ । मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ । मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है । इसलिए महामुनि ! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ । जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा ।
व्यासजी ने कहा- भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान् पुरुष मुख में न डालें, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है । इसके बाद द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण आदि का दान करे । इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करें । वर्षभर में जितनी एकादशियां होती हैं, उन सबका फल इस निर्जला एकादशी से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।”
कुन्तीपुत्र! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो । उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु यानी पानी में खड़ी गाय का दान करना चाहिए, सामान्य गाय या घी से बनी गाय का दान भी किया जा सकता है । इस दिन दक्षिणा और अनेकों प्रकार की मिठाइयों से ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए । उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं ।
जिन्होंने श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है । निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, फल, शय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए । जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है । चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इस कथा को सुनने से भी मिलता है ।
भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए । उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है । इसके बाद द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे । जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है ।
भीमसेन को व्यास जी ने सलाह दी कि अगर वे साल की सभी एकादशी नहीं कर सकते तो केवल निर्जला एकादशी का व्रत करें, जिससे सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाएगा । यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत किया ।
निर्जला एकादशी हिन्दू धर्म में आस्था और तपस्या का अद्भुत संगम है । यह एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तिथि को होती है और इसे सबसे कठिन व्रत माना जाता है, क्योंकि इस दिन व्रती न तो अन्न ग्रहण करता है और न ही जल ।
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