देव शयनी एकादशी…(Devshayani Ekadashi 2026)
Devshayani Ekadashi 2026: सनातन धर्म में वर्ष भर आने वाली चौबीस एकादशियों में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष स्थान है। इसे देव शयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi 2026), हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी तथा देव सोने की एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2026 में देव शयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) 25 जुलाई, शनिवार को मनाई जाएगी।
धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसके साथ ही चार माह तक चलने वाला चातुर्मास आरम्भ होता है। चातुर्मास का समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात देव प्रबोधिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ माना जाता है।
देव शयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) केवल उपवास का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, भक्ति, साधना और जीवन में अनुशासन का संदेश देने वाला महापर्व है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से पापों का क्षय, सुख-समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होने की मान्यता है।
(Devshayani Ekadashi) देव शयनी एकादशी 2026 कब है?
Devshayani Ekadashi: देव शयनी एकादशी तिथि 25 जुलाई 2026 दिन शनिवार एकादशी तिथि प्रारम्भ 24 जुलाई पंचांगानुसार एकादशी तिथि समाप्त 25 जुलाई को पंचांगानुसार पारण द्वादशी तिथि में चातुर्मास प्रारम्भ देव शयनी एकादशी से होता है। व्रत 25 जुलाई को किया जाएगा।
नोट: एकादशी का व्रत करते समय अपने क्षेत्र के मान्य पंचांग के अनुसार तिथि और पारण का समय अवश्य देखें।
(Devshayani Ekadashi) देव शयनी एकादशी क्या है?
देव शयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) का उल्लेख पद्म पुराण, स्कन्द पुराण तथा अन्य वैष्णव ग्रन्थों में मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु सृष्टि के पालन का कार्य अपने दिव्य नियमों के अनुसार संचालित करते हुए योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। यहाँ “शयन” का अर्थ सामान्य मनुष्य की तरह सो जाना नहीं है, बल्कि दिव्य योगमाया में स्थित होकर ब्रह्माण्ड के सूक्ष्म संचालन का प्रतीक माना गया है।
(Devshayani Ekadashi) हरिशयनी एकादशी क्यों कहते हैं?
Devshayani Ekadashi 2026: भगवान विष्णु का एक नाम “हरि” है। इस दिन भगवान हरि योगनिद्रा धारण करते हैं, इसलिए इसे हरिशयनी एकादशी कहा जाता है। वैष्णव सम्प्रदाय में यह अत्यन्त महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है।

भगवान विष्णु योगनिद्रा में क्यों जाते हैं? (Devshayani Ekadashi)
(Devshayani Ekadashi) शास्त्रों के अनुसार भगवान न तो कभी थकते हैं और न ही उन्हें विश्राम की आवश्यकता होती है। उनकी योगनिद्रा सृष्टि के संतुलन, ऋतु परिवर्तन, तप, संयम और आध्यात्मिक साधना के काल का प्रतीक है। वर्षा ऋतु के इन चार महीनों में ऋषि-मुनि एक स्थान पर रहकर जप, तप, स्वाध्याय और धर्मोपदेश करते थे। यही परम्परा आगे चलकर चातुर्मास के रूप में प्रतिष्ठित हुई।
देवताओं के शयन का क्या अर्थ है?
देवताओं का शयन यह संकेत देता है कि अब मनुष्य को बाहरी उत्सवों की अपेक्षा अपने भीतर की यात्रा पर अधिक ध्यान देना चाहिए। इस अवधि में संयम, सात्विक आहार, सेवा, दान, जप और ध्यान का विशेष महत्व बताया गया है।
चातुर्मास का आध्यात्मिक महत्व
चातुर्मास केवल धार्मिक परम्परा नहीं बल्कि आत्मशुद्धि का अवसर है। वर्षा ऋतु में प्रकृति स्वयं विश्राम और संतुलन की ओर अग्रसर होती है। इसी कारण साधकों के लिए यह समय मन, वाणी और कर्म को शुद्ध करने का श्रेष्ठ काल माना गया है। अनेक संत-महात्मा इसी अवधि में विशेष अनुष्ठान, प्रवचन और साधना करते हैं।
(Devshayani Ekadashi) देव शयनी एकादशी का धार्मिक महत्व
1. यह भगवान विष्णु को समर्पित सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है।
2. इसी दिन से चातुर्मास प्रारम्भ होता है।
3. विवाह, गृहप्रवेश और अन्य अनेक मांगलिक कार्य चातुर्मास समाप्त होने तक सामान्यतः स्थगित रखे जाते हैं।
4. इस दिन किया गया व्रत मन, वचन और कर्म की शुद्धि का माध्यम माना गया है।
5. भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की संयुक्त पूजा से सुख-समृद्धि की प्राप्ति की मान्यता है।
6. विष्णु सहस्रनाम, गीता और श्रीमद्भागवत का पाठ अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
7. गरीबों, गौशाला, मंदिर और जरूरतमंदों को दान देने का विशेष फल बताया गया है।
8. इस दिन तुलसी पूजन का भी विशेष महत्व है।
9. व्रत के साथ संयम, क्षमा और सदाचार का पालन करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है।
10. यह एकादशी व्यक्ति को भोग से योग तथा अहंकार से ईश्वर की ओर ले जाने का संदेश देती है।

शास्त्रीय दृष्टि
पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में एकादशी व्रत को अत्यन्त पुण्यदायक बताया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण भी संयम, सात्विक जीवन और भक्ति को मोक्ष का सरल मार्ग बताते हैं।
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥” (भगवद्गीता 9.22)
अर्थ: जो भक्त एकनिष्ठ भाव से भगवान का स्मरण और उपासना करते हैं, उनके योग-क्षेम अर्थात आवश्यकताओं और संरक्षण का भार स्वयं भगवान उठाते हैं।
देव शयनी एकादशी हमें यह शिक्षा देती है कि जीवन में केवल बाहरी सफलता ही पर्याप्त नहीं है। आत्मिक शांति, संयम, सेवा और ईश्वर के प्रति समर्पण ही वास्तविक सुख का आधार हैं। यदि श्रद्धा, नियम और सात्विक भाव से यह व्रत किया जाए तो यह केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर जीवन को नई दिशा देने वाला आध्यात्मिक पर्व बन जाता है।
देव शयनी एकादशी व्रत कैसे करें?
यदि श्रद्धा और नियमपूर्वक यह व्रत किया जाए तो इसका आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
ब्रह्ममुहूर्त में जागरण
– सूर्योदय से पहले उठें।
– भगवान का स्मरण करें।
– घर की साफ-सफाई करें।
– स्नान कर स्वच्छ अथवा पीले वस्त्र धारण करें।
संकल्प
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके जल, अक्षत और पुष्प हाथ में लें तथा भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
पूजा स्थान की तैयारी
– लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ।
– भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
– यदि उपलब्ध हो तो शालिग्राम एवं तुलसी दल भी रखें।
भगवान विष्णु का पूजन
पूजा क्रम इस प्रकार रखें-
– आचमन
– गणेश वंदना
– कलश स्थापना
– भगवान विष्णु का आवाहन
– पंचामृत अथवा शुद्ध जल से प्रतीकात्मक स्नान
– पीले वस्त्र अर्पित करें।
– चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
– तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।
– धूप और दीप प्रज्वलित करें।
– मौसमी फल एवं सात्विक भोग अर्पित करें।
ध्यान रखें: भगवान विष्णु की पूजा तुलसी दल के बिना अधूरी मानी जाती है। यदि किसी कारण ताज़ा तुलसी उपलब्ध न हो तो मानसिक रूप से तुलसी अर्पित करने की भावना भी की जा सकती है।
जप एवं पाठ
पूजा के पश्चात निम्न में से अपनी श्रद्धा अनुसार पाठ करें—
– विष्णु सहस्रनाम
– श्रीमद्भगवद्गीता
– विष्णु अष्टोत्तरशतनाम
– ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप
– श्रीसूक्त
– पुरुषसूक्त
यदि समय कम हो तो कम से कम 108 बार “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप अवश्य करें।
आरती
सायंकाल पुनः दीप प्रज्वलित कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें। परिवार के सभी सदस्य मिलकर हरिनाम संकीर्तन करें।
रात्रि जागरण
वैष्णव परम्परा में एकादशी की रात्रि में भजन, कीर्तन, विष्णु नामस्मरण और धर्मग्रंथों का श्रवण अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। यदि पूर्ण जागरण संभव न हो तो कुछ समय भगवान का ध्यान अवश्य करें।
अगले दिन पारण
द्वादशी तिथि में निर्धारित समय के भीतर व्रत का पारण करें।
पारण से पहले—
– भगवान को नैवेद्य अर्पित करें।
– ब्राह्मण, गौ या जरूरतमंद व्यक्ति को यथाशक्ति दान दें।
– इसके बाद सात्विक भोजन ग्रहण करें।
पूजा सामग्री
भगवान विष्णु का मुख्य पूजन
माता लक्ष्मी का पूजन
चौकी एवं पीला वस्त्र स्थापना
कलश मंगल प्रतीक
गंगाजल शुद्धि
चंदन तिलक
अक्षत पूजन
पीले पुष्प अर्पण
तुलसी दल भगवान विष्णु को अर्पित
धूप सुगंध
दीपक आरती
घी दीप प्रज्वलन
पंचामृत स्नान
मौसमी फल भोग
मिष्ठान्न नैवेद्य
नारियल पूजन
कपूर आरती
दक्षिणा दान
विशेष ध्यान देने योग्य बातें
– पूजा के दौरान मन शांत रखें।
– क्रोध, कटु वचन और विवाद से बचें।
– यथाशक्ति दान अवश्य करें।
– पूरे दिन भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करते रहें।
– यदि स्वास्थ्य कारणों से निर्जल व्रत संभव न हो तो फलाहार लेकर भी श्रद्धापूर्वक व्रत किया जा सकता है।
देव शयनी एकादशी का वास्तविक उद्देश्य केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म की शुद्धि है। श्रद्धा, भक्ति और सदाचार के साथ किया गया व्रत ही भगवान श्रीहरि को प्रिय माना गया है।
(Devshayani Ekadashi) देव शयनी एकादशी 2026: व्रत के नियम, क्या करें, क्या न करें, फलाहार और ज्योतिषीय महत्व
देव शयनी एकादशी व्रत के 20 प्रमुख नियम (Devshayani Ekadashi)
एकादशी व्रत केवल अन्न का त्याग नहीं है, बल्कि मन, वाणी और कर्म की शुद्धि का संकल्प है। शास्त्रों में व्रत के साथ सदाचार और संयम को समान महत्व दिया गया है।
1. ब्रह्ममुहूर्त में उठकर भगवान विष्णु का स्मरण करें।
2. स्नान के बाद स्वच्छ अथवा पीले वस्त्र धारण करें।
3. श्रद्धापूर्वक व्रत का संकल्प लें।
4. भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें।
5. पूजा में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।
6. पूरे दिन यथासंभव “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें।
7. विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या विष्णु चालीसा का पाठ करें।
8. मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करें।
9. क्रोध और कटु वचन से दूर रहें।
10. किसी का अपमान न करें।
11. जरूरतमंदों की सहायता करें।
12. गौ, पक्षियों और अन्य जीवों के प्रति दया रखें।
13. यथाशक्ति दान करें।
14. नशे और तामसिक वस्तुओं से दूर रहें।
15. यदि संभव हो तो रात्रि में भजन-कीर्तन करें।
16. द्वादशी तिथि में ही पारण करें।
17. व्रत को दिखावा न बनाएं।
18. ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव रखें।
19. पूरे दिन सकारात्मक विचार रखें।
20. व्रत को आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का माध्यम मानें।
(Devshayani Ekadashi) देव शयनी एकादशी के दिन क्या करें?
इस दिन किए गए शुभ कार्यों का विशेष महत्व माना गया है।
1. भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें।
2. तुलसी पूजन करें।
3. घर में दीपक जलाएँ।
4. गीता का पाठ करें।
5. विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
6. गरीबों को भोजन कराएँ।
7. गौ सेवा करें।
8. पक्षियों के लिए जल रखें।
9. वृक्ष लगाएँ।
10. माता-पिता का आशीर्वाद लें।
11. संत-महात्माओं का सम्मान करें।
12. मंदिर जाएँ।
13. यथाशक्ति दान करें।
14. सात्विक भोजन ग्रहण करें।
15. मन को शांत रखें।
16. धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करें।
17. परिवार के साथ भजन करें।
18. किसी जरूरतमंद की सहायता करें।
19. अपनी बुरी आदतों को छोड़ने का संकल्प लें।
20. भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखें।
(Devshayani Ekadashi) देव शयनी एकादशी के दिन क्या नहीं करें?
विभिन्न धर्मग्रंथों और परम्पराओं में कुछ कार्यों से बचने की सलाह दी गई है।
1. क्रोध न करें।
2. झूठ न बोलें।
3. किसी का अपमान न करें।
4. मांस, मदिरा और नशीले पदार्थों का सेवन न करें।
5. लहसुन और प्याज का सेवन न करें।
6. तामसिक भोजन न करें।
7. किसी जीव को कष्ट न पहुँचाएँ।
8. अपशब्दों का प्रयोग न करें।
9. चुगली और निंदा से बचें।
10. लालच न करें।
11. अनावश्यक विवाद न करें।
12. आलस्य में दिन व्यर्थ न करें।
13. अपवित्र स्थानों पर जाने से बचें।
14. व्रत का उपहास न करें।
15. ईश्वर की निंदा न करें।
16. व्यर्थ समय नष्ट न करें।
17. किसी का अधिकार न छीनें।
18. दिखावे के लिए दान न करें।
19. दूसरों के दोष न खोजें।
20. पारण का समय बिना कारण न छोड़ें।
ध्यान दें: विभिन्न सम्प्रदायों में कुछ नियमों में भिन्नता हो सकती है। अपने कुलाचार, गुरु या स्थानीय परम्परा का सम्मान करना भी उचित माना जाता है।
व्रत में क्या खाएँ?
स्वास्थ्य और श्रद्धा दोनों का ध्यान रखना आवश्यक है। यदि निर्जल व्रत संभव न हो तो फलाहार किया जा सकता है।
फलाहार
– केला
– सेब
– पपीता
– अमरूद
– अनार
– नारियल पानी
– मौसमी फल
– दूध
– दही
– मखाना
व्रत में बनने वाले सात्विक व्यंजन
– साबूदाना खिचड़ी
– साबूदाना खीर
– कुट्टू के आटे की पूरी या रोटी
– सिंघाड़े के आटे का हलवा
– राजगीरा लड्डू
– सामक के चावल
– मूंगफली
– सेंधा नमक
पारण में क्या खाएँ?
द्वादशी के दिन पारण के समय सात्विक भोजन करें, जैसे—
– मूंग की दाल
– चावल
– रोटी
– मौसमी सब्जियाँ
– खीर
– पंचामृत
कौन लोग यह व्रत कर सकते हैं?
बच्चे
छोटे बच्चों पर कठोर उपवास का दबाव न डालें। उन्हें उनकी आयु के अनुसार सरल व्रत कराया जा सकता है।
महिलाएँ
विवाहित और अविवाहित महिलाएँ श्रद्धापूर्वक यह व्रत कर सकती हैं।
वृद्ध
यदि स्वास्थ्य अनुमति दे तो फलाहार के साथ व्रत कर सकते हैं।
गर्भवती महिलाएँ
गर्भावस्था में कठोर उपवास करने के बजाय चिकित्सक की सलाह लेकर सात्विक आहार के साथ भगवान का स्मरण करना अधिक उचित है।
रोगी
मधुमेह, उच्च रक्तचाप या अन्य गंभीर रोगों से पीड़ित व्यक्ति बिना चिकित्सकीय सलाह के निर्जल या कठोर उपवास न करें।
कामकाजी लोग
यदि पूरा उपवास संभव न हो तो फलाहार के साथ भी श्रद्धा और भक्ति से व्रत किया जा सकता है।
(Devshayani Ekadashi) व्रत का वैज्ञानिक महत्व
यद्यपि व्रत का मूल उद्देश्य आध्यात्मिक साधना है, फिर भी नियंत्रित उपवास के कुछ संभावित स्वास्थ्य लाभ आधुनिक शोधों में भी देखे गए हैं। ये लाभ व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य और जीवनशैली पर निर्भर करते हैं।
पाचन तंत्र को विश्राम
हल्का भोजन या उपवास पाचन तंत्र को कुछ समय का विश्राम देता है।
मानसिक शांति
ध्यान, जप और प्रार्थना तनाव कम करने तथा मन को शांत रखने में सहायक हो सकते हैं।
अनुशासन
व्रत व्यक्ति में आत्मनियंत्रण और नियमित जीवनशैली विकसित करने में मदद करता है।
आध्यात्मिक ऊर्जा
सकारात्मक चिंतन, भक्ति और संयम व्यक्ति के मानसिक और आध्यात्मिक विकास में सहायक माने जाते हैं।
महत्वपूर्ण: यदि किसी को कोई गंभीर बीमारी है तो केवल धार्मिक कारणों से कठोर उपवास करना आवश्यक नहीं है। स्वास्थ्य की रक्षा भी धर्म का ही एक अंग है।
देव शयनी एकादशी का ज्योतिषीय महत्व
यह विवरण पारंपरिक वैदिक ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित है।
ज्योतिष शास्त्र में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता माना गया है। उनकी उपासना से जीवन में संतुलन, धैर्य और सकारात्मकता आने की मान्यता है।
किन ग्रहों से संबंध माना जाता है?
– बृहस्पति (गुरु): धर्म, ज्ञान और सद्बुद्धि।
– चन्द्रमा: मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन।
– बुध: विवेक और निर्णय क्षमता।
– शुक्र: परिवार में सुख, सौहार्द और समृद्धि।
किन दोषों में लाभ की मान्यता है?
परंपरागत मान्यता है कि भगवान विष्णु की आराधना से जीवन में आने वाली अनेक बाधाओं, मानसिक अशांति तथा ग्रहजनित कष्टों में राहत की प्रार्थना की जाती है। हालांकि किसी विशेष ग्रहदोष के उपाय के लिए योग्य ज्योतिषाचार्य से व्यक्तिगत परामर्श लेना उचित रहता है।
भगवान विष्णु की कृपा कैसे प्राप्त करें?
– नियमित विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
– तुलसी की सेवा करें।
– एकादशी का पालन करें।
– सत्य और धर्म का पालन करें।
– जरूरतमंदों की सेवा करें।
– अहंकार का त्याग करें।
– माता-पिता और गुरु का सम्मान करें।
देव शयनी एकादशी का वास्तविक फल तभी प्राप्त होता है जब व्रत केवल शरीर का नहीं, बल्कि मन, वाणी और व्यवहार का भी हो। भगवान श्रीहरि के प्रति श्रद्धा, करुणा, सेवा और सत्य का आचरण ही इस पवित्र एकादशी का सबसे बड़ा संदेश है।
(Devshayani Ekadashi) देव शयनी एकादशी 2026 की पौराणिक कथा..
देव शयनी एकादशी का महत्व अनेक पुराणों में वर्णित है। विशेष रूप से पद्म पुराण, भविष्योत्तर पुराण, स्कन्द पुराण तथा वैष्णव परम्परा के ग्रंथों में इस एकादशी की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। विभिन्न परम्पराओं में कथाओं के विवरण में कुछ अंतर अवश्य मिलता है, किन्तु सभी का मूल संदेश भगवान श्रीहरि विष्णु की भक्ति, धर्म पालन और आत्मसंयम है।
राजा मान्धाता की कथा
प्राचीन समय में सूर्यवंश में राजा मान्धाता नाम के एक अत्यंत धर्मात्मा, न्यायप्रिय और प्रजावत्सल राजा राज्य करते थे। उनके राज्य में सभी लोग सुखी थे। समय पर वर्षा होती थी, खेतों में भरपूर अन्न उत्पन्न होता था और चारों ओर समृद्धि का वातावरण था।
एक समय ऐसा आया जब राज्य में लगातार कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। नदियाँ और सरोवर सूखने लगे, पशु-पक्षी भोजन और जल के अभाव में व्याकुल हो गए तथा प्रजा अकाल से पीड़ित हो उठी। राजा ने अपने मंत्रियों और विद्वानों से कारण पूछा, परंतु कोई स्पष्ट समाधान नहीं मिला।
तब राजा मान्धाता अनेक ऋषि-मुनियों से मिलते हुए महान तपस्वी महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक अकाल का कारण और उसके निवारण का उपाय पूछा।
महर्षि अंगिरा ने बताया कि धर्म की रक्षा और लोककल्याण के लिए राजा स्वयं तथा समस्त प्रजा को आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। भगवान विष्णु की आराधना, दान, जप और भक्ति से वर्षा होगी तथा राज्य पुनः समृद्ध हो जाएगा।
राजा ने पूरे राज्य में देव शयनी एकादशी का व्रत कराया। सभी लोगों ने भगवान श्रीहरि की पूजा की, दान दिया और धर्म का पालन किया। भगवान विष्णु की कृपा से शीघ्र ही वर्षा हुई, खेत लहलहा उठे और राज्य में सुख-समृद्धि लौट आई।
यह कथा हमें सिखाती है कि जब समाज धर्म, संयम और सदाचार का पालन करता है तो प्रकृति भी संतुलित रहती है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने की कथा
वैष्णव मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीहरि विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा धारण करते हैं। इसके पश्चात चार महीने तक समस्त देवता भी विशेष तप और विश्राम की अवस्था में माने जाते हैं।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि भगवान का “शयन” सांसारिक निद्रा नहीं है। वे सर्वव्यापक, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं। उनकी योगनिद्रा ब्रह्मांड के सूक्ष्म संचालन, सृष्टि के संतुलन और आध्यात्मिक साधना के काल का प्रतीक मानी जाती है।
चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी (देव प्रबोधिनी एकादशी) के दिन भगवान के जागरण का उत्सव मनाया जाता है। इसी कारण देव शयनी से देव प्रबोधिनी तक की अवधि को चातुर्मास कहा जाता है।
भगवान विष्णु के शयन का आध्यात्मिक रहस्य
1. आध्यात्मिक दृष्टि
योगनिद्रा का संदेश है कि मनुष्य भी समय-समय पर अपने भीतर झाँके। केवल बाहरी उपलब्धियाँ ही जीवन का लक्ष्य नहीं हैं। आत्मनिरीक्षण, ध्यान, जप और ईश्वर का स्मरण भी उतना ही आवश्यक है।
2. दार्शनिक दृष्टि
संसार परिवर्तनशील है, परन्तु भगवान शाश्वत हैं। योगनिद्रा हमें सिखाती है कि परिवर्तन के बीच भी अपने भीतर स्थिरता बनाए रखना ही आध्यात्मिक जीवन का आधार है।
3. वैदिक दृष्टि
वर्षा ऋतु में प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि भ्रमण बंद कर एक स्थान पर रहकर वेदाध्ययन, यज्ञ, तपस्या और शिष्यों को शिक्षा देते थे। इसी परम्परा ने आगे चलकर चातुर्मास का स्वरूप ग्रहण किया।
4. जीवन प्रबंधन की दृष्टि
देव शयनी एकादशी हमें यह प्रेरणा देती है कि वर्ष में कुछ समय आत्मचिंतन, जीवन का मूल्यांकन, गलत आदतों को छोड़ने और नई सकारात्मक शुरुआत के लिए अवश्य निकालना चाहिए।
अपने आराध्य देव को प्रसन्न करने के लिए, करें चालीसा पाठ. दिन के अनुसार करें या मन के अनुसार.
दुर्गा चालीसा , गणेश चालीसा, हनुमान चालीसा, संतोषी चालीसा, शिव चालीसा, सूर्य चालीसा, शनि चालीसा, विष्णु चालीसा, गायत्री चालीसा, काली चालीसा, शारदा चालीसा, खाटू श्याम चालीसा, श्री राम चालीसा, श्री महालक्ष्मी चालीसा, बगलामुखी चालीसा, श्री गौरी चालीसा, वैष्णों चालीसा, भैरव चालीसा, श्री ललिता चालीसा, सरस्वती चालीसा, श्री परशुराम चालीसा.

